Wednesday, January 1, 2020

बुंदेली कहावतें / लोकोक्तियाँ



अक्कल के पाछें लट्ठ लयें फिरत

अक्कल को अजीरन

अकेलो चना भार नईं फोरत

अकौआ से हाती नईं बंदत

अगह्न दार को अदहन

अगारी तुमाई,पछारी हमाई

अपनी इज्जत अपने हाथ

अंदरा की सूद

इतै कौन तुमाई जमा गड़ी

इनईं आंखन बसकारो काटो

इमली के पत्ता पपे कुलांट खाओ

ईंगुर हो रही

उंगरिया पकर के कौंचा पकरबो

उखरी में मूंड़ दओ,तो मूसरन को का डर

उठाई जीव तरुवा से दै मारी

उड़त चिरैंया परखत

उड़ो चून पुरखन के नाव

उजार चरें और प्यांर खायें

उनकी पईं काऊ ने नईं खायीं

उन बिगर कौन मॅंड़वा अटको

उल्टी आंतें गरे परीं

ऊंची दुकान फीको पकवान

ऊंटन खेती नईं होत

ऊंट पे चढ़के सबै मलक आउत

ऊटपटांग हांकबो

एक कओ न दो सुनो

एक म्यांन में दो तलवारें नईं रतीं

ऐसे जीबे से तो मरबो भलो

ऐसे होते कंत तौ काय कों जाते अंत

ओंधे मो डरे

ओई पातर में खायें, ओई में धेद करें

ओंगन बिना गाड़ी नईं ढ़ंड़कत

कंडी कंडी जोरें बिटा जुरत

कतन्नी सी जीव चलत

कयें खेत की सुने खरयान की

करिया अक्षर भैंस बराबर

कयें कयें धोबी गदा पै नईं चढ़त

करता से कर्तार हारो

करम छिपें ना भभूत रमायें

करें न धरें,सनीचर लगो

करेला और नीम चढो‌‌

का खांड़ के घुल्ला हो, जो कोऊ घोर कें पीले

काजर लगाउतन आंख फूटी

कान में ठेंठा लगा लये

कुंअन में बांस डारबो

कुंआ बावरी नाकत फिरत

कोऊ को घर जरे, कोऊ तापे

कोऊ मताई के पेट सें सीख कें नईं आऊत

कोरे के कोरे रे गये

कौन इतै तुमाओ नरा गड़ो

खता मिट जात पै गूद बनी रत

खाईं गकरियां,गाये गीत, जे चले चेतुआ मीत

खेत के बिजूका

गंगा नहाबो

गरीब की लुगाई, सबकी भौजाई

गांव को जोगी जोगिया,आनगांव को सिद्ध

गोऊंअन के संगे घुन पिस जात

गोली सें बचे, पै बोली से ना बचे

घरई की अछरू माता,घरई के पंडा

घरई की कुरैया से आंख फूटत

घर के खपरा बिक जेयें

घर को परसइया,अंधियारी रात

घर को भूत,सात पैरी के नाम जानत

घर घर मटया चूले हैं

घी देतन वामन नर्रयात 

घोड़न को चारो, गदन कों नईं डारो जात

चतुर चार जगां से ठगाय जात

कौआ के कोसें ढ़ोर नहिं मरत

चलत बैल खों अरई गुच्चत

चित्त तुमाई,पट्ट तुमाई

चोंटिया लेओ न बकटो भराओ

छाती पै पथरा धरो

छाती पै होरा भूंजत

छिंगुरी पकर कें कोंचा पकरबो

छै महीनों को सकारो करत

जगन्नाथ को भात,जगत पसारें हाथ

जनम के आंदरे, नाव नैनसुख

जब की तब सें लगी

जब से जानी,तब सें मानी

जा कान सुनी, बा कान निकार दई

जाके पांव ना फटी बिम्बाई, सो का जाने पीर पराई

जान समझ के कुआ में ढ़केल दओ

जित्ते मों उत्ती बातें

जित्तो खात, उत्तई ललात

जित्तो छोटो, उत्तई खोटो

जैसो देस, तैसो भेष

जैसो नचाओ, तैसो नचने

जो गैल बताये सो आंगे होय

जोलों सांस, तौलों आस

झरे में कूरा फैलाबो

टंटो मोल ले लओ

टका सी सुनावो

टांय टांय फिस्स

ठांडो‌ बैल,खूंदे सार

ढ़ोर से नर्रयात

तपा तप रये

तरे के दांत तरें, और ऊपर के ऊपर रै गये

तला में रै कें मगर सों बैर

तिल को ताड़ बनाबो

तीन में न तेरा में, मृदंग बजाबें डेरा में

तुम जानो तुमाओ काम जाने

तुम हमाई न कओ,हम तुमाई न कयें

तुमाओ मो नहिं बसात

तुमाओ ईमान तुमाय संगे

तुमाये मों में घी शक्कर

तेली को बैल बना रखो

थूंक कैं चाटत

दबो बानिया देय उधार

दांत काटी रोटी

दांतन पसीना आजे

दान की बछिया के दांत नहीं देखे जात

धरम के दूने

नान सें पेट नहीं छिपत

नाम बड़े और दरसन थोरे

निबुआ, नोंन चुखा दओ

नौ खायें तेरा की भूंक

नौ नगद ना तेरा उधार

पके पे निबौरी मिठात

पड़े लिखे मूसर

पथरा तरें हाथ दबो

पथरा से मूंड़ मारबो

पराई आंखन देखबो

पांव में भौंरी है

पांव में मांदी रचायें

पानी में आग लगाबो

पिंजरा के पंछी नाईं फरफरा रये

पुराने चांवर आयें

पेट में लात मारबो

फूलो नईं समा रओ

बऊ शरम की बिटिया करम की

बचन खुचन को सीताराम

बड़ी नाक बारे बने फिरत

बातन फूल झरत

मरका बैल भलो कै सूनी सार

मन मन भावे, मूंड़ हिलाबे

मनायें मनायें खीर ना खायें जूठी पातर चांटन जायें

मांगे को मठा मौल बराबर

मीठी मीठी बातन पेट नहीं भरत

मूंछन पै ताव दैवो

मौ देखो व्यवहार

रंग में भंग

रात थोरी, स्वांग भौत

लंका जीत आये

लम्पा से ऐंठत

लपसी सी चांटत

लरका के भाग्यन लरकोरी जियत

लाख कई पर एक नईं मानी

सइयां भये कोतबाल अब डर काहे को

सकरे में सम्धियानो

समय देख कें बात करें चइये

सोउत बर्रे जगाउत

सौ डंडी एक बुंदेलखण्डी

सौ सुनार की एक लुहार की

हम का गदा चराउत रय

हरो हरो सूजत

हांसी की सांसी

हात पै हात धरें बैठे

हात हलाउत चले आये

हुइये बही जो राम रूचि राखा

होनहार विरबान के होत चीकने पात

✒ सत्येन्द्र सिंह किसान
    १/१/२०२०_०९:०४रात


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